योगवसिष्ठ महारामायण में मन का स्वरुप

Authors

  • उज्जवल कुमार पीएच.डी.शोधार्थी, लकुलिश योग विश्वविद्यालय
  • अखिलेश कुमार विश्वकर्मा असिस्टेंट प्रोफेसर, लकुलिश योग विश्वविद्यालय

DOI:

https://doi.org/10.69968/ijisem.2026v5i1248-253

Keywords:

योगवसिष्ठ, मन, चित, मनोनिग्रह, जीवनमुक्ति

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र मुख्य रूप से योगवसिष्ठ में वर्णित मन का दार्शिनक एवं विश्लेष्णात्मक अध्ययन किया गया है। जिसमे मुख्य रूप से मन का अर्थ, स्थान, कार्य, जीवन्मुक्ति एवं मन का सम्बंध एवं निग्रह के उपाय आदि का वर्णन किया गया है। जिसमे विवेक, वैराग्य, वासनाक्षय, मुक्ति के चार द्वारपाल एवं आत्म विचार को मन की शुधि का प्रमुख साधन माना गया है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि मन ही दुःख-सुख, बंधन-मोक्ष आदि का मुख्य कारण है। आज के समय में लोग मानसिक अशांति एवं अनियमित सोच से दुखी लोग के लिय योगवसिष्ठ में वर्णित मन की शिक्षा मनुष्य के लिय बहुत लाभ करी सिद्ध होती है।

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Published

11-03-2026

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Articles

How to Cite

[1]
उज्जवल कुमार and अखिलेश कुमार विश्वकर्मा 2026. योगवसिष्ठ महारामायण में मन का स्वरुप. International Journal of Innovations in Science, Engineering And Management. 5, 1 (Mar. 2026), 248–253. DOI:https://doi.org/10.69968/ijisem.2026v5i1248-253.